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Behtar Bachpan Hindi 2017-2022

उद्देश्य तथा अवधारणा
यह सुनिश्चित करना कि हमारे बच्चे जो कि हमारे परिवार, समाज व राष्ट्र के पथ-प्रदर्शक हैं आगे चलकर एक बेहतर नागरिक, सफल उद्यमी, सुखी व सम्पन्न व्यक्ति और भरोसेमंद भूमिका निभायें । इस मकसद को पाने के लिए हम ग्रामीण भारत के बच्चों को वैज्ञानिक विधि से उनका मनोवैज्ञानिक, सृजनात्मक, शारीरिक ,तार्किक और सामाजिक विकास कर उनको सशक्त बनाने की ओर अग्रसर हैं । 68 प्रतिशत से अधिक भारतीय जनसंख्या गाँवों में निवास करती है, इस आबादी के ग्रामीण बच्चों के विकास के लिए वैज्ञानिक तकनीकें उपलब्ध नही हैं । यह एक सुखद एहसास है कि हमारी सामुदायिक विकास की अवधारणा के तहत हम पंचायत, गाँव के वयोवृद्ध व्यक्तियों , अभिभावकों तथा शैक्षिक संस्थानों के सहयोग से अपने इस बाल विकास अभियान को आधारभूत स्तर से संचालित कर रहे हैं । हम इस के लिए वैश्विक स्तर पर प्रमाणित एक ऐसे शैक्षिक वातावरण को संचालित करेंगे जो बच्चों को सशक्त और साधन-सम्पन्न बनायेगा जिस से उनमें अभीष्ठ कौशल तथा संस्कारों समावेश हो सकेगा । इस से उनके जीवन में सृजनाशक्ति व सम्पन्नता आ सकेगी । इसके लिए हम उनके पालन-पोषण और बाल-शिक्षा में आमूलचूल बदलाव लाने के पक्षधर हैं । 0 से 7 वर्ष की उम्र में बच्चे में पर्याप्त बौद्धिक व शारीरिक-समन्वयन का विकास हो जाता है । यही वो समय है जब ग्रामीण बच्चों के विकास के लिए औपचारिक तथा वैज्ञानिक पालन-पोषण लगभग दुर्लभ होता है । सामुदायिक विकास की हमारी पद्धतियाँ पूर्णत वैज्ञानिक तथा पूर्व प्रमाणित हैं । हम प्री-स्कूल स्तर के बच्चों की शिक्षा तथा उनके विकास के लिए एक ऐसा वातावरण प्रदान करते है जिस में प्रेम, सीखना, प्रशिक्षण तथा देखभाल तो शामिल है ही साथ ही उनका बौद्धिक, शारीरिक व कौशल का विकास भी सम्मिलित है । इस से यह सुनिश्चित हो सकेगा कि वे आगे चलकर कुशाग्र बुद्धि , सेहतमंद, स्वाभिमानी व आत्मविश्वास से लबरेज़ होंगे । भविष्य में उनमें असुरक्षा तथा हीनभावना नही होगी जिससे वे सतत रूप से प्रगति कर सकेंगे । बेहतर बचपन के हमारे समावेशी कार्यक्रम, जो वैश्विक रूप से प्रमाणित तथा समय की कसौटी पर खरा उतरा है, से जहाँ बच्चे उत्कृष्ठ परिणाम लाएंगे वहीं अभिभावक तथा शिक्षक भी लाभान्वित होंगे ।
वर्तमान में भारत की प्री-स्कूल शिक्षा का परिदृश्य 
भारत में अधिकाँश बच्चे विक्टोरियन पद्धति की शिक्षा पाते हैं । इसमे पहले से तय पाठ्यक्रम का अनुपालन किया जाता है । यह रटने और परीक्षा के दौरान उसको फिर से प्रस्तुत करने का उपक्रम है । सदियों पुरानी इस पद्धति से बच्चे में किसी भी प्रकार की सृजनात्मकता का विकास नही होता है और वह कूप-मंडूप बना रहता है । पराम्परागत स्कूली शिक्षा में विस्तृत जाँच-परख व सतत रूप से सीखते रहने की कोई गुंजाईश नही है जो कि इस प्रतिस्पर्धात्मक युग में सफल बने रहने के लिए ज़रुरी है । आने वाले कल में नव प्रवर्तन के लिए सतत रूप से सीखते रहने तथा विविध विषयों पर पारंगत बने रहने की ज़रुरत होगी जिस से भविष्य के इन होनहारों में सकारात्मकता, सृजनशीलता, धैर्य , सहिष्णुता तथा आत्मविश्वास के गुण हों । 
पहली आश्यकता 
इसी लिए एक ऐसे बाल-केन्द्रित व सामुदायिक प्री-स्कूल शिक्षा कार्यक्रम की अत्यंत आवश्यकता है जिस में अभिभावकों, शिक्षकों, हेल्थ-वर्कर, गाँव/समुदाय के वयोवृद्ध व्यक्तियों तथा स्थानीय निकायों की सक्रिय भूमिका हो । बाल विकास के विभिन्न पहेलुओं को विकसित करने के उद्देश्य से समाज को भी अभिप्रेरित करने की ज़रुरत है । जिस से वे भी अपना सक्रिय योगदान दे सकें ।

बाल – सदभाव तथा सामुदायिक कल्याण कार्यक्रम मॉडल के मुख्य बिन्दु 
पहुँच 
वैश्विक रूप से मान्य, वैज्ञानिक रूप से बेहतर तथा समय की कसौटी पर परखी गयी प्री-स्कूल शिक्षा का यह कार्यक्रम ग्रामीण तथा सुदूर स्थानों पर उपलब्ध करवाना । 
ग्रामीण प्रोजेक्ट का मूल्याँकन 
आरम्भ मे एक पीआरए (Participating Resource Appraisal) कार्यक्रम के तहत प्री-स्कूल शिक्षा के प्रति ग्रामीणों की जानकारी तथा राय ली जाती है । ग्रामीणों के रुझान को समझने के लिए काफी समय तक उनके साथ प्री-स्कूल शिक्षा के विषय में विचार-विमर्श किया जाता है ताकि वे बच्चों की शिक्षा तथा उनकी प्रगति के बारे में स्वयं पहल कर सकें । ये कदम यह सुनिश्चित करता है कि सभी इस कार्यक्रम को अपना समझें तथा दूसरों को भी इस में भागीदारी करने के लिए प्रोत्साहित करें । 
समुदाय; एक क्लासरुम की तरह 
पंचायत को शिक्षकों के चयन, परिसर को किराये पर लेने तथा एकत्रित शुल्क के संरक्षण में भागीदार बनाना ताकि वे सतत रूप से प्रोजेक्ट से जुड़े रहें । 
सेवक 
स्थल पर काम करने वाले ऐसे स्थानीय स्वयंसेवी जो अपने गाँव, जिले व प्रदेश के विकास के लिए प्रतिबद्द हों । उनको उन के स्तर के अनुसार ग्रामसेवक, जिलासेवक, प्रदेश सेवक तथा राष्ट्रीय सेवक कहा जाएगा । 
शिक्षा सेविका 
शिक्षा सेविकायें, उसी गाँव की शिक्षित-प्रशिक्षित महिलायें होंगी । उनका चयन पंचायत की उपस्थिति में किया जाएगा । सेविकाओं को हमारे विशेषज्ञों द्वारा प्रशिक्षण दिया जाएगा । इस प्रशिक्षण से यह सुनिश्चित करवाया जाएगा कि 0-7 वर्ष के आयु वर्ग के बच्चे गतिविधियों पर आधारित प्रणाली से व खेल- खेल में आधारभूत ज्ञान हासिल कर सकें । उनमें खोजी प्रवृत्ति का समावेश हो जिस से उनमें अभीष्ठ सृजनात्मकता, सेहत के प्रति जागरुकता तथा गणीतिय व तर्क शक्ति विकास हो

पाठ्यक्रम तथा विषय-वस्तु 
पाठ्यक्रम स्थानीय विषय वस्तुओं पर आधारित होगा । इस से बच्चों में कौशल निर्माण , ज्ञान वर्धन तथा उत्तरोत्तर ज्ञान प्राप्ति की प्रवृत्ति का विकास होगा । विषय वस्तु रोचक तथा जानी पहचानी होगी । हम बच्चे को सुनेंगे तथा उस को समझने में समय लगायेंगे । विषय वस्तु को इस प्रकार डिजाईन किया जाएगा कि वो बच्चों को समझने में आसान हो तथा वे ग्रहण कर सकें । पाठ्यक्रम की प्रमुख विषय वस्तु होगी – तय गतिविधियों के द्वारा संरचनात्मक भागीदारी, अंग्रेजी व हिन्दी में संवाद-शैली का विकास, अंको का ज्ञान व उपयोग, सांसारिक चीजों का ज्ञान, सफाई तथा स्वच्छता, सुरक्षा के प्रति सतर्कता, समय बद्धता तथा शारीरिक गतिविधियों के द्वारा कौशल विकास । इस से बच्चे में जीवन-पर्यन्त ज्ञान को पाने की लालसा के साथ साथ संस्था के उत्तरोत्तर विकास का मार्ग प्रशस्त होगा । 
हमारा आशय : एक सुपरिभाषित, व्यापक रूप से स्वीकार्य तथा अद्यदित पाठ्यक्रम ग्रामीण शिक्षा तथा प्री-स्कूली शिक्षा की सबसे कमजोर कड़ी को सुधारने में अपना योगदान देगा । 
कम्प्यूटिंग डाटा मॉडल 
कम्प्यूटिंग संसाधनों का व्यापक रूप से किया जाएगा । इस से यह जानने में मदद मिलेगी कि विकास तथा उद्देश्यों को पूरा करने में कितनी परगति हुई है । साथ ही सभी आँकड़े केन्द्रीयकृत तथा डिजीटल रूप में सुरक्षित भी रहेंगे । ऐतिहासिक रूप से गाँवों में शिक्षा का स्वरूप समूह तथा अनुकरण पद्दति का रहा है । हम तकनीकों की सहायता से सीखने की प्रक्रिया को रियल टाईम, आत्मानुवेषी, सम्बद्ध तथा बच्चों व समुदाय की बेहतरी से जोड़ने के लिए प्रतिबद्द हैं । 
प्रथमत:, हमने अपने लिए सकल डिजीटल आधार को विकसित किया है । हमारे सम्पूर्ण संसाधन डिजीटल रूप में परिवर्तित किया गया है । हमारा विश्वास है कि आँकड़े सभी के लिए तभी लाभकारी होते हैं जब उनको साझा और सभी के लिए वांछित समय व स्थान पर सुलभ करवाया जा सके । 
दूसरे, हम अपने उपयोगकर्ता को गंभीरता से सुनते हैं व स्वयं को उनकी अपेक्षाओं के अनुरुप व्यवस्थित करते हैं । प्रवर्तन की इस प्रक्रिया के दौरान उपयोगकर्ता की सुविधा व आवश्यकता के अनुसार उसको सिस्टम तक पहुँच मुहैया करवाई जाती है ताकि वह सीखने प्रगति में उत्साहपूर्वक भाग ले सके । 
तीसरे, सूचनाओं को इस प्रकार व्यवस्थित रखना जिस से उसे सभी परिचालित कर सकें तथा यह सर्वसुलभ हो । 
चौथे, उपयोगकर्ता द्वारा डिजीटल डाटा का पूरा उपयोग किया जा सके, इस के लिए क्लाउड बेस्ड तकनीक का प्रयोग करना जिस से श्रम व धन की बचत की जा सके । क्लाउड बेस्ड तकनीक से सूचनाओं तक आसानी से पहुँच होने के कारण भागीदारी करने वाले व्यक्तियों को सीखने व सीखाने में अधिक लाभ होगा ।

वित्तीय रूपरेखा 
“ हम कुछ विवरण पर विश्वास कर सकते हैं परन्तु इस में विस्तार की आवश्यकता है ।“ 
ग्रामीण स्तर गाँव के समस्त वित्त का नियन्त्रण ग्राम पंचायत के पास होगा जिस से लेनदेन में पारदर्शिता बनी रहे । छात्र ग्रामीण सेवक को शुल्क देंगे । 
दान जितना हमें ग्रामीन बच्चों के प्रति गर्व है उतना ही आत्मगौरव हमें अपने संस्थान पर भी है । अपनी नीति के अनुसार हम व्यक्तिगत यानि व्यक्ति विशेष द्वारा दिए गए दान को स्वीकार नही करते, ऐसा करने पर वह हमारे कार्यक्रम में अवांछित हस्तक्षेप करेगा । प्री स्कूल शिक्षा व बाल-संरक्षण का हमारा अद्वितीय कार्यक्रम बहुत उच्च स्तर की प्रतिबद्धता , अडिग अनुशासन, जीवन पर्यन्त बाल-विकास की सोच तथा सामुदायिक कल्याण पर आधारित है । 
कारपोरेट सहभाग 
हम ऐसे कारपोरेट संस्थानों के साथ सहभागिता के लिए तैयार हैं जो गाँवों को गोद लें तथा सामुदायिक विकास मे भागीदारी करें । 
चुनौतियाँ 
“For men may come and men may go, But I go on forever” Lord Alfred Tennyson
बाधायें तथा रुकावटें, किसी भी संस्थान के लिए अपरिहार्य घटक हैं । हम इस को संस्थान की प्रगति व विकास के लिए एक आवश्यकता के तौर पर देखते हैं । हालांकि हमारी संस्था की प्रगति में हम निम्न चुनौतियों को प्रमुखता से देखते हैं :- 
शिक्षक का कौशल 
हमारे शिक्षक धाराप्रवाह अंग्रेजी, सही उच्चारण कर पाने , वाक्य-संरचना तथा आत्म विश्वास में कमी सो सकती है । लेकिन उनमें उच्चतम निष्ठा व कार्य के प्रति प्रतिबद्धता होगी । उचित मार्ग-दर्शन व सहयोग से उनको निपुण बनाया जा सकता

पाठ्यक्रम की असफलता 
शिक्षण व्यक्तित्व तथा मानवीय प्रवृत्तियों से जुड़ा क्षेत्र है । इसमें इस बात की संभावना सदा ही बनी रहती है कि पाठ्यक्रम का मॉडल असफल भी हो जाए । हमारा पाठ्यक्रम कम्प्यूटर पर शुरू होगा तथा ऑफ लाईन टेस्ट के जरिए इसका मूल्यांकन होगा । हम स्थलीय समस्याओं का परीक्षण कर अपने पाठ्यक्रम में बदलाव लाते रहेंगे । 
संस्थागत स्मृति 
वर्तमान समय की रटने की प्रणाली के चलते संस्थागत समृति का ह्रास हो रहा है । हमने अपने हर चरण में गतिविधि, सहयोग तथा अधिगम का लक्ष्य रखा है । बेहतर बचपन प्री स्कूल तथा बाल संरक्षण के क्षेत्र में निरन्तर प्रगति करते हुए उच्चतम उपलब्धियाँ हासिल करेगा । 
शिक्षा प्रदान करना 
हमारे शिक्षा केन्द्र देस के विस्तृत भूभाग पर फैले हैं । कम खर्चीली तकनीक की सहायता से लर्निंग सेन्टर से सुदूर क्लास रुम में शिक्षा का प्रसार करना चुनौतीपूर्ण कार्य है । 
ग्रामीणों द्वारा कार्यक्रम की स्वीकार्यता 
ग्रामीण परिवेश के ग्रामीणों का मानना है कि लिखना ही, शिक्षा है। हमें समुदायों व अभिभावकों को इस बात के लिए सहमत करना होगा कि शिक्षण की हमारी पद्धति जिसमें बच्चे स्वयं करके तथा खेल-खेल में आधुनिकतम तकनीकों का प्रयोग करते हुए सीखेंगे जिस से सर्वांगीण बाल-विकास होगा । इस प्रकार हमारी वैश्विक रूप से स्वीकार्य शिक्षण प्रणाली ग्रामीण मान्यताओं को परिवर्तित कर सकेगी । हमने सदा ही “गाँव की हदों से परे” के आदर्श की हिमायत की है । इस में ग्रामीण परिवेश का बच्चा न सिर्फ अपने आसपास की दुनिया के बारे में शिक्षित होगा वरन प्रोद्यौगिकी की मदद से शेष दुनिया के बारे में भी जान सकेगा । 
ग्रामीणों के लिए उपलब्ध विकल्प 
वर्तमान में ग्रामीण अभिभावकों के पास सरकार द्वारा संचालित आँगनवाड़ी केन्द्रों का विकल्प मौजूद है । बहुतायत में होने के बावजूद ये केन्द्र अव्यवस्था के शिकार हैं । ,ये सिर्फ एक पालने की तरह हैं जहाँ बाल-विकास तथा व्यापक रूप से सीखने पर कोई ध्यान नही दिया जाता । 
सरकारी नीतियाँ 
कुछ मामलों में सरकारी नीतियाँ तथा कुछ राज्य बाधा बनेंगे । 
प्रोजेक्ट का विमोचन 
जब आपको प्रगति करनी है तो आपको ऐसा मार्ग चुनना है जिस में न्यूनतम अवरोध हों । इसलिए हमारा प्रोजेक्ट सर्वप्रथम राजस्थान के भरतपुर, अलवर तथा ग्रामीण जयपुर से आरम्भ होगा तथा धीरे-धीरे इसका प्रसार अखिल भारतीय स्तर पर किया जाएगा ।


Our Testimonials

Hamara Behatar Bachpan is a great effort towards helping improve  our village toddler's future.I want the first centre in my village;for this I shall give my school as the venue.

Man Singh ji (Sarpanch)Jakhrana, Behror,Alwar (Rajasthan )

It is my firm believe that this endeavor will help the children of my village to develop holistically and empower the educated girls by involving them into this project.

Esther Shimray (Village Elder) Tamenglong District, Manipur

I feel privileged to be asso ciated with Toddlers transformation in achivives and effort fowards early education. I an really imprersed with the work being done by the NGO. I wish Toddlers Work for major all the best is bringing smiles to the poor children in india.

Sunita SirohiMangolpuri North west District, New Delhi

Please wait.....